धर्म: वह शब्द जिसे हमने सबसे अधिक गलत समझा

आज यदि किसी से पूछा जाए, "आपका धर्म क्या है?", तो अधिकांश लोग तुरंत उत्तर देंगे—

"मैं हिन्दू हूँ।"

"मैं मुस्लिम हूँ।"

"मैं ईसाई हूँ।"

"मैं सिख हूँ।"

मानो धर्म का अर्थ केवल किसी संप्रदाय या धार्मिक पहचान का नाम हो।

यहीं से सबसे बड़ी भूल शुरू होती है।

क्योंकि धर्म का अर्थ केवल किसी मज़हब, पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज या पहचान तक सीमित नहीं है।

वास्तव में, हम शायद उन सबसे गहरे शब्दों में से एक का अर्थ ही भूल चुके हैं।

धर्म आखिर है क्या?

प्रख्यात विपश्यना आचार्य एस. एन. गोयनका जी धर्म को बहुत सरल शब्दों में समझाते थे।

वे कहते थे—

"धर्म संप्रदाय नहीं है। धर्म प्रकृति का नियम है।"

यह एक ऐसा नियम है जो हर मनुष्य पर समान रूप से लागू होता है।

चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम।

ईसाई हो या बौद्ध।

आस्तिक हो या नास्तिक।

प्रकृति किसी से यह नहीं पूछती कि तुम किस धर्म के हो।

वह केवल यह देखती है कि तुम उसके नियमों के अनुसार जी रहे हो या नहीं।

क्रोध का कोई धर्म नहीं होता

कल्पना कीजिए—

एक हिन्दू व्यक्ति क्रोध करता है।

एक मुस्लिम व्यक्ति भी क्रोध करता है।

एक ईसाई व्यक्ति भी क्रोध करता है।

क्या क्रोध केवल किसी एक व्यक्ति को दुःख देगा?

नहीं।

तीनों सबसे पहले स्वयं बेचैन होंगे।

उनकी धड़कन तेज होगी।

मन अशांत होगा।

विचार अस्थिर हो जाएँगे।

यही प्रकृति का नियम है।

इसी प्रकार—

यदि कोई व्यक्ति लोभ से भर जाता है,

तो सबसे पहले उसका अपना मन अशांत होता है।

यदि कोई ईर्ष्या करता है,

तो सबसे पहले वही भीतर से जलता है।

प्रकृति कभी यह नहीं पूछती—

"तुम किस संप्रदाय से हो?"

वह केवल अपना नियम लागू करती है।

यही धर्म है।

और जब मन निर्मल होता है...

अब इसका दूसरा पक्ष देखिए।

जब मन में करुणा आती है,

तो सबसे पहले शांति हमें ही मिलती है।

जब हम किसी की सहायता करते हैं,

तो संतोष पहले हमारे भीतर जन्म लेता है।

जब हम क्षमा करते हैं,

तो सबसे पहले हमारा अपना बोझ हल्का होता है।

यही भी प्रकृति का नियम है।

यही भी धर्म है।

धर्म कोई पहचान नहीं, जीवन जीने का विज्ञान है

यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन मंदिर जाता है,

लेकिन घर लौटकर झूठ बोलता है,

क्रोध करता है,

लोगों को धोखा देता है,

तो क्या वह धर्म का पालन कर रहा है?

यदि कोई व्यक्ति मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे जाता है,

लेकिन उसके मन में घृणा भरी हुई है,

तो क्या केवल पूजा-पद्धति उसे धार्मिक बना देती है?

शायद नहीं।

क्योंकि धर्म का संबंध बाहर से पहले भीतर से है।

यदि भीतर अशांति है,

तो बाहर के अनुष्ठान केवल दिखावा बन सकते हैं।

धर्म का सबसे सरल उदाहरण

मान लीजिए आपके हाथ में जलता हुआ कोयला है।

आप उसे किसी दूसरे पर फेंकना चाहते हैं।

लेकिन उससे पहले वह आपके अपने हाथ को जलाता है।

क्रोध भी ऐसा ही है।

घृणा भी।

ईर्ष्या भी।

लोभ भी।

दूसरे को हानि पहुँचाने से पहले ये सबसे पहले हमें ही जलाते हैं।

इसी प्रकार,

प्रेम,

मैत्री,

करुणा,

और सद्भाव भी सबसे पहले हमारे भीतर शांति उत्पन्न करते हैं।

यही धर्म का विज्ञान है।

बुद्ध ने धर्म को कैसे समझाया?

भगवान बुद्ध ने धर्म को किसी नए संप्रदाय के रूप में नहीं सिखाया।

उन्होंने कहा—

बुरे कर्मों से बचो।

अच्छे कर्म करो।

अपने मन को निर्मल बनाओ।

बस।

यही धर्म है।

यह किसी विशेष पोशाक पर निर्भर नहीं है।

किसी भाषा पर नहीं।

किसी जाति पर नहीं।

किसी पूजा-पद्धति पर नहीं।

यह हर मनुष्य पर समान रूप से लागू होने वाला जीवन का नियम है।

यदि धर्म इतना सरल है, तो भ्रम कहाँ पैदा हुआ?

समय के साथ हमने धर्म को जीवन से हटाकर केवल पहचान बना दिया।

हमने सोचना शुरू कर दिया कि—

धर्म का अर्थ है—

कौन-सा मंदिर?

कौन-सी मस्जिद?

कौन-सा त्योहार?

कौन-सी परंपरा?

जबकि ये सब किसी संप्रदाय की पहचान हो सकते हैं,

लेकिन धर्म का सार नहीं।

धर्म तो यह है—

क्या मैं सत्य बोलता हूँ?

क्या मेरे कारण किसी को अनावश्यक पीड़ा नहीं पहुँचती?

क्या मेरा मन क्रोध, लोभ और द्वेष से मुक्त हो रहा है?

क्या मेरे व्यवहार से समाज बेहतर बन रहा है?

यही प्रश्न धर्म के हैं।

आज समाज को किस धर्म की आवश्यकता है?

आज दुनिया को नए संप्रदायों की आवश्यकता नहीं है।

उसे धर्म की आवश्यकता है।

ऐसे धर्म की—

जो मन को शांत करे।

जो व्यक्ति को ईमानदार बनाए।

जो समाज में विश्वास बढ़ाए।

जो करुणा सिखाए।

जो हमें जोड़ने का कार्य करे, बाँटने का नहीं।

यदि धर्म हमें एक-दूसरे से लड़ा रहा है,

तो संभव है कि हम धर्म नहीं, केवल अपनी पहचान की रक्षा कर रहे हों।

धर्म वह है जो मन को निर्मल बनाए।

जो जीवन को संतुलित करे।

जो समाज को बेहतर बनाए।

और जो हमें यह समझाए कि प्रकृति का नियम सब पर समान रूप से लागू होता है।

गोयनका जी का अमूल्य संदेश

एस. एन. गोयनका जी बार-बार कहा करते थे—

"धर्म कोई संप्रदाय नहीं है; धर्म तो जीने की कला है।"

जब हम इस एक वाक्य का अर्थ समझ लेते हैं,

तो धर्म बहस का विषय नहीं रहता,

अनुभव का विषय बन जाता है।

फिर हमारा प्रश्न यह नहीं रहता कि "मेरा धर्म क्या है?"

बल्कि यह हो जाता है—

"क्या मैं ऐसा जीवन जी रहा हूँ जो मेरे भीतर शांति और मेरे आसपास के लोगों के लिए कल्याण का कारण बने?"

शायद यही वह प्रश्न है जिसे भगवान बुद्ध पूछना चाहते थे।

और शायद यही धर्म का वास्तविक अर्थ भी है।

 

 

 

 

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